रूबरू

“कुमार विकल” जी हिन्दी के एक बहुत ही जाने माने क्रांतिकारी कवि हुए हैं. कुमार विकल हिन्दी में ‘अकविता’ आन्दोलन के प्रमुख कवियों में से एक रहे। उन्होंने रूसी और विभिन्न भारतीय भाषाओं में कविताऒं का अनुवाद किया हैं. उनका जन्म सन १९३५ में वज़ीराबाद, ज़िला गुजरात (अब पाकिस्तान में) और निधन २३ फरवरी १९९७ को हुआ. एक छोटी-सी लड़ाई (१९८०), रंग ख़तरे में है (१९८७), निरुपमा दत्त मैं बहुत उदास हूँ (१९९३) उनके कुछ प्रमुख कविता संग्रह हुए हैं. उनकी कुछ कविताये मुझे बहुत अच्छी लगी जो मैं यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ . उम्मीद हैं की आप लोगो को भी पसंद आएगी

फर्क

एक छोटी —सी बात को लेकर

मैं बहुत रोया

रोने के बाद बहुत सोया

सोकर उठा तो बहुत सोचा

क्या हर आदमी रोता है?

मार्क्स एंगिल्स और लेनिन भी रोये थे.


हाँ ज़रूर रोये थे

लेकिन, रोने के बाद कभी नही सोये थे

अगर वे इस तरह सोये रहते

तो दुनिया के करोड़ों लोग कभी न जाग पाते.

मशाले

प्रियजन जो कभी मशालों की तरह जलते थे

धीरे-धीरे बुझ रहे हैं

औ’ मेरे इर्द-गिर्द

जो रोशनी के अनेक घेरे थे

दुश्मन अंधेरों के आगे झुक रहे हैं

नहीं, यह कभी नहीं हो सकता

मैं इन मशालों को फिर से जलाऊँगा

चाहे, मैं ख़ुद होम हो जाऊँगा

चीखे

अब चीखने से क्या फ़ायदा

दीवारें इतनी उँची उठ चुकी हैं

कि उनके भीतर

तुम केवल अपनी आवाज़ की अनुगूँज ही सुन पाओगे

और जब दीवारों से अपना सिर टकराओगे

तो अपनी हथेली पर

अपना ही खून पाओगे|


इस तरह ख़ून बहाने से कोई फ़ायदा नहीं

अपनी सुरक्षा मे चक्रव्यूह में

मारा गया आदमी शहादत नहीं पायेगा

इतिहास के पन्नों में याद नहीं किया जायेगा

इतिहास अन्धा नहीं होता

इतिहास दिखता है

इंतज़ार करता है

इतिहास बड़ा क्रूर होता है

लेकिन एक बहादुर माँ की ममता—सा मजबूर होता है|

समय है कि तुम अब भी

अपनी चीख़ को

एक ख़तरनाक छलाँग में बदल डालो


खुदा का चेहरा

एक दिन मैं शराब पीकर

शहर के अजायब घर में घुस गया

और पत्थर के एक बुत के सामने खड़ा हो गया.

गाइड ने मुझे बताया

यह ख़ुदा का बुत है.


मैंने ख़ुदा के चेहरे की ओर देखा

और डर से काँपता हुआ बाहर की ओर भागा

क्या ख़ुदा हा चेहरा इतना क्रूर हो सकता है !

मैं शराबख़ाने में लौट आया

और आदमक़द आईने के सामने खड़ा हो गया

इस बार मैं पागलों की तरह चीखा

और शराबख़ाने से निकल आया

आदमक़द आईने में मैं नहीं था

अजायब घर वाले ख़ुदा का बुत खड़ा था.


मैं एक पार्क में पहुँचा

जाड़े की धूप ऊन के गोले की तरह खुल रही थी

और एक लड़की अपने शर्मीले साथी से कह रही थी

आज के दिन को एक ‘पुलओवर’ की तरह समझो

और इसे पहन लो

और कसौली की चमकती हुई बर्फ़ को देखो

इन दिनों वह ख़ुदा की पवित्र हँसी की तरह चमकती है

ख़ुदा की पवित्र हँसी!

मैं लड़की की इस बात पर ठहाके से हँस दिया.


लड़की चौंकी

लेकिन उसकी आँखों में डर नहीं था

चमकता हुआ विस्मय था

और वह अपने साथी से कह रही थी

उस शराबी को देखो

वह तो ख़ुदा की तरह हँस रहा है.


रंग भेद


कभी—कभी यह शहर

मेरा भी होता है

कम से कम उस रोज़

जब कसौली की सुरमई पहाड़ियों पर पर पड़ी बर्फ़

एक साँवली लड़की के दूधिया दाँतों की तरह चमकती है

और शहर की धूप से अठखेलियाँ करती है.


मैं अपने कविता वर्ष से पहले की कविता लिखता हूँ

और सारे शहर म्रें फैल जाता हूँ

शराबखानों दोस्तों के अड्डों,प्रियजनों के घर

न जाने

कहाँ —कहाँ अपनी नवजात कवित को लिए फिरता हूँ.


जी मेरी कविता गौरवर्णा नहीं

ज़रा साँवली —सी है

एक संथाल बच्ची की तरह खुरदरी

जो बड़ी हो कर

गुलाबी फ़्राक नहीं पहनेगी

आइसक्रीम नहीं खाएगी

तितली नहीं कहलाएगी

नंगे पाँव ही अपने लोगोम के बीच भाग जाएगी.

…. लेकिन यह अपने लोग कौन होते हैं

किस तरह के घरों में रहते हैं

एक नंग—धडंग संथाल कविता के बारे में

किस तरह से सोचते हैं.


यह मुझे अगली सुबह

पता चलता है

जब अख़बार में

कसौली की बर्फ़ और मेरी कविता के बारे में

ख़बरें एक साथ छपती हैं


कसौली की बर्फ़ तो श्वेता बन जाती है

लेकिन मेरी कविता

एक शराबी पिता की

काली कलूटी बेटी कहलाती है

जिसके शरीर से संभ्रांत लोगों को

घटिया शराब की बदबू आती है.


उस समय मुझे पहली बार

अहसास होता है

कि इस शहर में ताँगे क्यों नहीं चलते

मैं किसी घोड़े की गरदन से लिपट कर रोना चाहता हूँ


और बहुत रोना चाहता हूँ

कि जब भी कोई कवि

अपनी कस्विता को

शहर के संभ्रांत हिस्से में लेकर जाता है,

वह हमेशा टूट कर वापिस आता है.


लेकिन मेरी कविता—

मेरी बच्ची

मुझे अपनी साँवली मुस्कान से हर्षाती है

उसकी आँखों में कोई सपना नहीं

एक विश्वास भरी भाषा है

वह मेरी छाती से चिपक जाती है

और उसके अँगों की मज़बूती

मेरी चेतना में फैल जाती है.

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under अंतरद्वंद

दहशत में मुंबई

मुंबई को दहशतगर्दो द्वारा मौत और आंतक का घिनोना खेल खेले हुए अब एक हफ्ते से भी ज्यादा समय हो गया हैं! २६ नवम्बर के बर्बरपूर्ण फिदायीन हमले के बाद मैं न्यूज़ चैनल (न्यूज़ कम नौटंकी ज्यादा) और गूगल न्यूज़ से चिपका रहा और पूरे घटनाक्रम को देखता रहा ! सबसे पहले मैं सलाम करता हूँ उन बहादुर सुरक्षाबलों को जिन्होंने अपनी जान गवांकर कई जिंदगिया महफूज की और देश को दहशत के चंगुल से मुक्त कराया ! पता नही कब हमारे मुल्क के खद्दरधारी इन जवानों के खून की कीमत समझेंगे !

जैसा की अक्सर होता हैं ऐसी आंतकी घटना के बाद मीडिया में चर्चाये होती हैं कुछ विशेषज्ञ लोग टीवी पर अपनी राय देते हैं, सियासी लीडर अपनी पॉलिटिक्स को दिशा देते हैं और कुछ दिनों के बाद ये कर्मकाण्ड ख़तम हो जाता हैं और फिर इंतज़ार होने लगता हैं अगली ऐसी ही आंतकी घटना का ! शायद ये भारत के हर आम आदमी की नियति बन गई हैं! आम आदमी की जान की यहाँ कोई कीमत नही हैं ! पता नही कब हम लोग जागेंगे ! इस सारी घटना के दौरान कलाई खुली हमारी खुफिया एजेन्सीओ की विफलता की और हमारे समुंदरी सीमा की सुरक्षा की ! इतने बड़े फिदायीन हमले की योजना बनी और हमारी खुफिया एजेन्सीओ को ख़बर तक नही ! हमारे पास रा के अलावा भी कई जांच एजेन्सीआ हैं लेकिन इनमें तालमेल का जबरदस्त अभाव हैं! सीबीआई तो यहाँ पर गद्दीनशीं लोगो द्वारा विपक्ष पर दबाव डालने वाला हतियार बन कर रह गया हैं! इस समय आतंकवाद से लड़ने के लिए जरुरत एक संघीय गुप्तचर एजेन्सी की हैं बशर्ते की वह सरकारी दखल से दूर हो ! हमें इस मामले में इजरायल की मोसाद से बहुत कुछ सीखने की जरुरत हैं!

सबसे ज्यादा नफरत मुझे यहाँ के सियासी लीडरान से हैं! जिस तरह ये नेता आंतकवाद को भी धरम के चश्मे से देख रहे हैं वो आने वाले समय में भारत के लिए बहुत खतरनाक साबित होने जा रहा हैं! ये इन नेताओ की राजनितिक दहशतगर्दी नही हैं तो और क्या हैं! मेरे विचार से महजब आदमी की व्यक्तिगत आस्था का मामला होता हैं और इसे व्यक्तिगत ही रहने दे तो ही समाज का भला हैं! धरम समाज पर लादने वाली चीज़ नही हैं! किसी को भी  किसी  धरम और जाति के ख़िलाफ़ जहर उगलने की इजाज़त नही होनी चहिये और ऐसा करने वालो को सख्त सज़ा मिलनी चाहिए! महजबी आज़ादी होनी चाहिए लेकिन उतनी नही की समाज के लिए नासूर बन जाए! सही मायनो में कोई भी धरम समाज को जोड़ने का काम करता हैं तोड़ने का नही !  ये बात मैं देश की सभी राजनितिक पार्टियों से कहना चाहता हूँ की धरम और राजनिति का ये घालमेल एक समय इस देश को बरबाद कर देगा ! पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान इसका उदहारण हैं! दहशतगर्द केवल दहशतगर्द होता हैं उसका कोई धरम नही होता हैं और उससे जितनी सख्ती से निबटा जाए उतना कम हैं! मेरे ख्याल से आतंकवाद से निबटने के लिए पोटा और टाडा जैसे सख्त कानून होना चहिये लेकिन इसको लगाने का अधिकार राज्य सरकार के पास न होकर केंद्रीय सरकार के पास होना चहिये ताकि राज्य सरकारों द्वारा इसके दुरोपयोग से बचा जा सके !

एक बार फिर नेताओ के दोहरे चेहरे और शहीदों के लिए उनके मन में कितनी इज्ज़त हैं, जगजाहिर हो गई इसके बारे में बताने की जरुरत नही !  कुछ बड़बोले नेताओ और कुछ संभ्रांत वर्ग के लोगो द्वारा पाकिस्तान से युद्ध की बात हो रही हैं, कोई कह रहा हैं की मैं प्रधानमंत्री होता तो पाकिस्तान पर हमला कर देता वगरह वगरह ! क्योंकि पता हैं युद्ध में जवान का खून बहना हैं जो या तो किसी किसान मजदूर का बेटा हैं या किसी आम आदमी का ! कितने elite क्लास के लोग अपने बेटे को आर्मी में भेजना पसंद करते हैं? ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठकर बातें बनाना बहुत आसान होता हैं! बड़बोलेपन से या फिर भावनाओ के ज्वार में बहकर मौमबत्ती जलने से कुछ नही होता, काम करने से होता हैं! वैसे भी पाकिस्तान एक दम तोड़ता देश हैं और उसको अस्थिर करके अपने लिए समस्या को और बढावा देना हैं! एक स्थिर पाकिस्तान ही हमारे लिए सही हैं लेकिन आतंकी कैम्पस को ख़तम करने के लिए पाकिस्तान पर जबरदस्त दबाव बनाये रखना चाहिए! पाकिस्तान हुक्मरान पर भरोसा करना सबसे बड़ी मुर्खता हैं! पाकिस्तान सरकार कहती हैं की हमारा चरमपंथियों पर कोई कंट्रोल नही हैं और हम खुद समस्याओ से घिरे हुए हैं तो उसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? एक बार फिर २० आंतकवादियों की सूची भारतीय सरकार द्वारा पाकिस्तान को सौपी गई हैं! जब हमारी जांच एजेन्सीओ को उनके पाकिस्तान में ठिकाने मालूम हैं तो क्यों नही हम इजरायल की तरह खुफिया आपरेशन द्वारा उन्हें वही पर ख़तम नही करा देते? क्यों हमें हर बार दुनिया के सामने सबूतों का धिन्डोरा पीटना पड़ता हैं और फिर भी होता कुछ नही ! अब हमें अपने मुल्क के बाशिंदों की हिफाजत के लिए कुछ अतिवादी कदम उठाने ही पड़ेगे बेशक वो कदम ज़ंग नही हैं, दुश्मन को जहाँ पर वो छिपा हैं वही ख़तम करना हैं! लेकिन क्या ऐसा होगा? मेरा जवाब हैं नही क्योंकि जब तक हम ऐसी सड़ी-गली राजनितिक व्यवस्था की लाश ढोते रहेंगे कुछ बदलने वाला नही ! बीबीसी के पूर्व संवाददाता सर मार्क टली के अनुसार भारत एक विशालकाय समुद्री जहाज जैसा है जो हिलता डुलता हुआ पानी को चीरता चलता है और ऐसे आंधी तूफ़ान में भी डूबता नहीं जिसमें छोटी नौकाएं या अस्थायी जहाज़ डूब जाते हैं! लेकिन इस देश के सियासतदान कही एक दिन इसे डूबा ना दे !

5 टिप्पणियाँ

Filed under अंतरद्वंद

दीवानगी

आखिरी दम तक हिम्मत ना हारने वाले एक दीवाने के संघर्ष करने की जिजीविषा को एक अजनबी कवि ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया हैं. उम्मीद करता हूँ की पाठको को यह कविता पसंद आएगी..

समां ही अलग थी उस रात की जिस रात की दास्ताँ-ऐ-बयान करने जा रहा था वो
ना था कोई  नाम, ना ही कोई पता
बस एक शब की हथेली पर चला जा रहा था वो.
सूरज की गरमी ने पिघलादी थी आँखें उसकी,
अंधेरे की परछाई बने चले जा रहा था वो.

“थक गया हूँ इस भीड़ भाड़ से,
इस दुनिया की डरपोक चाल से,
मैं ऐसी जगह को जाऊँगा, सितारों से घर बनाऊँगा,
जहाँ इंसान अल्लाह की नही, इंसानों की इबादत करते हैं,
जहाँ इश्क को इश्क से नही पर जूनून से तुलना करते हैं….जूनून से तुलना करते हैं.”

अरे तू  ठहरा पागल लड़का, तेरी बात ना मानू मैं ,
करता है तू अल्लाह की बात पर अपनी हालत देखा है?
तू गिर जाएगा, तू डर जाएगा,
तू गिर जाएगा डर जाएगा, हाड मांस का पुतला ठहरा,
इस दरिया में बह जाएगा.
ला दे दे अपना हाथ मुझे, मैं उस पार पहुँचा दूँगा,
सितारों से तौ पहचान नही, मिटटी का घर बनवा दूँगा.

“छोड़ मुझे बुजदिल की जबान, तू मुझे  कहाँ  ले जाएगा,
जिस किनारे खड़ा है तू, तू उसी भंवर में डूब जाएगा.
तू क्या समझे पागलपन को, कभी आसमा को छूया है?
कभी हवाओं के कंधे पर बैठ, इस जन्नत को देखा है?
इस गिरने के  डर को पाले, क्या तुने कभी उड़ना सीखा है?
मैं गिरता हूँ, चोट लगती है,
मैं गिरता हूँ चोट लगती है, इस हाड मांस  के बदन से
खूनो की चीख निकलती है.

दर्द के मारे आंखें ज़ोर से, कर  लेता हूँ मैं अपनी बंद,
दिखते मुझे वही सितारे, क्या इसको कहते हैं पागलपन?
क्या देखता तू , मुझे इस हैरानियत से?
जा खोज इस पागल को हर एक की इंसानियत में,
मैं पागल नही दीवाना हूँ,
शमा जला कर करदे राख भी तौ क्या?
मैं उसका परवाना हूँ .

इस दर्द में भी एक सुकून हैं, जो मेरे हाथों की लकीर हैं,
गंगा के पानी पर तैरती मेरी अपनी ही ज़मीन हैं,
पहाडों से टकराता हूँ, गीले पत्तो की तरह ठहर जाता हूँ,
यह पाक दीवानगी बुझने का नाम नही लेती,
जलता हुआ ही सही, कहीं और उड़ जाता हूँ.

पर देखना साकी, एक दिन ऐसा भी आयेगा
जब मेरी मोहब्बत अपनी ज़बान फरमाएगा ,
नही कहेगा शब्द, आग से होगी बातें,
अपने होठों के किनारे पिघल जाएँगी रातें.
आँखें ओझल पर पूरी कायनात दिखेगी
यह कोई आम रात नही, क़यामत की रात होगी.
बदन मिलेंगे एक दूसरे से हजारों साल बाद,
हाँ ये दुनिया फ़िर से सजदा करेगी..

जानता तौ मैं भी नही इन सितारों को, पर रिश्ता है बड़ा ही गहरा,
लम्हों के गुलदस्ते में, ये है मेरा फूल सुनहरा,
सितारों से घर ना बना सका तौ क्या,
इस बदन से ही हजारों सितारे बना दूँगा.
उंगलीयों के बीच रख रख कर,
जन्नत को ही रोशन कर दूँगा.

मैं ठहरा दीवाना, मेरी अपनी ही ज़मीन है…
मैं ठहरा दीवाना, मेरी अपनी ही ज़मीन है…”

टिप्पणी करे

Filed under आवारा मन

नास्तिक और आस्तिक

आह ! आज काफी दिनों बाद लिखने के लिए कुछ वक्त निकाल पाया हूँ ! ऐसा नही हैं कि ज्यादा व्यस्त रहता हूँ बस दिन का पता ही नही चलता कि कब बीत गया ! खैर छोडो इस बात को…एक सवाल हमेशा मेरे मन में हमेशा कौधता रहता हैं कि आख़िर इंसान एक ऐसी चीज़ जिसे भगवान अल्लाह गाड़ कहते हैं में क्यों विश्वास करता हैं ! आख़िर इस अंधविश्वास का क्या कारण हैं? परिवार के प्रभाव के कारण मैं भी पहले भगवान् को मानता था ! लेकिन धीरे धीरे जैसे जिंदगी आगे बढ़ती चली गई या यूं कहें जो जो जिंदगी और इस दुनिया कि सच्चाई से रूबरू होता चला गया मेरा विश्वास लोगो के कल्पनालोक में गढे गए इस  तथाकथित भगवान से उठता चला गया ! मैं हैरान हूँ कि लोगो के इस विश्वास का क्या आधार हैं ? मुझे बचपन कि एक घटना याद आती हैं जब मन्दिर में मूर्तियों द्वारा दूध पीने कि अफवाह फैली थी ! मैं भी कुछ भक्तिभावना  🙂 और कुछ जिज्ञासा वश अपनी बच्चाटोली संग मन्दिर में दूध पिलाने गया लेकिन मेरी चमच से रत्तीभर भी दूध कम नही हुआ ! बस फिर क्या हुआ मैंने पुजारी को पकड़ लिया और पूछा कि क्या माजरा हैं ये ? बस पुजारी को जवाब क्या देना था कह दिया तुम अधर्मी हो तुममे श्रद्धा नही हैं इत्यादि ! लेकिन आज भी मेरे कुछ दोस्त इस घटना को पूरी शिद्दत से भगवान् का ही चमत्कार मानते हैं !
मेरे भगवान् को मानने वाले लोगो से कुछ सवाल हैं! आस्तिक लोग कहते हैं कि इस दुनिया कि रचना भगवान्  ने कि हैं ! मैं पूछता हूँ कि आख़िर इस दुनिया को बनाने का क्या कारण हैं ? क्या इसीलिए बनाया हैं कि भगवान अपनी इस रचना से खिलोनो की तरह खेलता रहे ! जिसको जब चाहा भूखा मार दिया किसी को बिना कपड़ो के ठंड से मार दिया या किसी को बमबारी करवा के मरवा दिया जैसे की छोटे बच्चे अपने खिलोनो से खेलते हैं ! कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं हैं ! जब भगवान् सर्व पालनहार सर्वशक्तिमान हैं तो फिर ये स्थिति क्यों हैं ? अब दो ही बातें हो सकती हैं या तो यह सर्व पालनहार, सर्वशक्तिमान परमपर्मेश्वर वाली बात सब बकवास हैं या फिर भगवान् का कोई अस्तित्व ही नही हैं ! केवल समाज के कुछ तथाकथित श्रेष्ठ लोगो ने अपने फायदे के लिए कपोल कल्पित परिकथा की तरह भगवान् की रचना कर दी ताकि उसका डर दिखा कर अपनी मनमानी कर सके और जनता का शोषण कर सके ! आख़िर भगवान् हैं तो उसे इन महलनुमा मंदिरों मस्जिदों गिरिजाघरों की क्या जरुरत हैं ? उसकी ये कोशिश क्यों रहती हैं कि लोग उसे माने उसकी पूजा करे ? ऐसी कहानिया क्यों हैं कि जो भगवान् को नही मानता उसका विनाश हो जाता हैं ? और फिर आख़िर क्यों भगवान् के मन्दिर में ही भेदभाव क्यो होता हैं ? क्यों कुछ तथाकथित वंचित लोगो का मन्दिर में प्रवेश निषेध हैं ? क्यों वंचित पिछडे  लोगो के  मन्दिर अलग होते हैं?  आख़िर क्यों कुछ प्रभावशाली लोगो के मन्दिर में दर्शन के लिए अलग से व्यवस्था होती हैं ? मंदिरों, मस्जिदों गिरिजाघरों के पास जो अकूत ताकत धन दौलत हैं  आख़िर उसका क्या राज हैं ? मेरे विचार से अगर उसका कोई अस्तित्व हैं तो वो बहुत लाचार असहाय और बेचारा हैं जो अपने घर को भी ठीक से नही रख सकता !

हिटलर ने  तो सिर्फ़ कुछ समय के लिए इस दुनिया को दुःख के सागर में डूबाया कुछ लाख लोगो कि हत्याये कि लेकिन आज उसका इतिहास में
क्या नाम हैं ?  उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से हिटलर की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं! एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत हिटलर को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित कह सकते  हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं? इसलिए मैं पूछता हूँ कि उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता और हिटलर में क्या फर्क है ?

टिप्पणी करे

Filed under अंतरद्वंद

आज के समय भगत सिंह

आख़िर आज मैंने भी ब्लॉग की दुनिया से अपना नाता जोड़ लिया. इसका सारा श्रेय मेरे मित्र अनुपम को जाता हैं जिसने मुझे हिन्दी में यह ब्लॉग लिखने के लिए प्रेरित किया. अब देखता हूँ की मैं अपने इस प्रयास में कहाँ तक सफल हो पाता हूँ. अब मेरे सामने ये समस्या आई की अपनी प्रथम प्रविषटी के लिए किस विषय को चुनाव करूँ. काफी मंथन के बाद मैंने निर्णय लिया कि क्यों न मैं सबसे पहले अपने आदर्श “शहीद भगत सिंह” के बारे में लिखूं .

वैसे भी इस वर्ष हम भगत सिंह का जन्मशती वर्ष मना रहे हैं. लेकिन यह बात देख कर अत्यन्त निराशा हुई कि एक-दो कर्यकर्मो को छोड़ कर क्रांति का यह महानायक आज पूरी तरह विस्मर्त कर दिया गया हैं. वैसे भी सरकारी स्तर पर भारत कि तथाकथित लोकतात्रिंक सरकार का हमेशा भगत सिंह, सुभाष जैसे महानायाको से दूरी बनाये रखने का प्रयास  रहा हैं. यह बात और हैं कि ये  क्रांति के अगुआ हमेशा लोगो के दिलो में जिंदा रहे. वैसे भी स्वंत्रता आन्दोलन में एक मत (कांग्रेस) को ज्यादा महत्व मिला और जो सत्ता में होता हैं उसी का इतिहास ज्यादा गाया बजाया जाता हैं.  आज जरुरत इस बात पर मंथन करने की हैं कि क्या भगत सिंह के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि उनके समय में थे. आज भारत को आजाद हुए ६० वर्ष बीत चुके हैं लेकिन मुझे नही लगता कि आम आदमी कि दुश्वारिया कम हुई हैं. पहले अंग्रेज सत्ता में थे अब अपने ही लोग गद्दी पर काबिज होकर जनता का शोषण कर रहे हैं. आज भी पुलिस का वही आतंक हैं. प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाने वाले को आतंकवादी घोषित करके मौत के घाट उतार दिया जाता हैं. धर्म के उन्माद में भाई भाई का गला काट रहा हैं और राजनितिक पार्टिया अंग्रेजो कि “फूट डालो राज करो ” कि नीति का अनुसरण करते हुए अपना उल्लू सीधा कर रही हैं. कुछ भी तो नही बदला हैं. किसान मजदूर अब भी बेहाल हैं. अब साहूकार की जगह बैंक उन्हें कर्ज के मकड़जाल में फंसाकर उन्हें मौत को गले लगाने को विवश कर रहे हैं. सच तो यह हैं कि कुछ भी नही बदला हैं केवल ब्रिटिश राज के द्वारा सत्ता का हस्तांतरण कुछ प्रभावशाली लोगो के हाथ में हुआ हैं जो आगे भी उन्ही के मॉडल का अनुसरण करके उनके हितों कि पूर्ति कर  सके. भगत सिंह व्यवस्था में ऐसा बदलाव चाहते थे जहाँ आम आदमी की आवाज़ सुनी जा सके.  आज देश में पनपती सांप्रदायिक ताकतों की वजह से भगत सिंह बहुत प्रासंगिक हो गए हैं. आज अगर भगत सिंह होते तो सबसे पहले इन सांप्रदायिक और जातिवादी व्यवस्था को बढ़ावा देने वाले लोगों का विरोध करते. भगत सिंह ने एक लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ ” को लिख कर धर्म और ईश्वर के बारे में अपना मत प्रगट किया. उन्होने लिखा हैं कि निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक होता  है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी. यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.

आज भारत वर्ष में पूंजीवादी शक्तिया हावी हैं. इसकी वजह से अमीरी-गरीबी के बीच की खाई चौडी होती जा रही हैं. आम आदमी सरकार की तथाकथित उदारीकरण नीतियों के कारण आज विभ्रम की स्थिति में हैं. देश के होनहार युवक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए टेक्नो कुली बन कर रह  गए हैं. किसान मजदूर की स्थिति अब पहले से भी बदतर हो गई हैं. अब वह इस चकाचोंध में ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करता हैं. वैसे भी उदारीकरण नीतियों के कारण जिन तकनीकी दक्ष पेशेवर लोगो के पास धन आया हैं वह भी घूम फिरकर इन्  बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेब में जा रहा हैं क्योंकि ये कंपनिया मासिक किस्तों में भुगतान आदि का मकड़जाल बुनकर आज के  इस  नव्धनादय वर्ग  को अपने उत्पाद खरीदने के लिए विवश कर देती हैं. भगत सिंह पहले ऐसे भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्होंने तर्क दिया था कि साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद एक पूरी व्यवस्था है. इनकी यह सोच बनने का सबसे बड़ा कारण रूस की क्रांति और समाजवादी विचार धारा थी . उन्होंने साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद को ख़त्म करने की बात कही थी. मार्क्सवाद पर आधारित लेख- लेटर टू यंग पॉलिटिकल वर्कर्स में उन्होंने युवाओं को संबोधित किया था. उन्होंने आधुनिक-वैज्ञानिक समाजवाद की बात की थी.

शहीद भगत सिंह ने कहा था कि हम नौजवान हैं और अपनी जबावदेही जानते हैं. लेकिन जब हमारे देश को आज भगत सिंह की इतनी जरूरत है तो हम क्यों न भगत सिह के सपनों को साकार करने की ईमानदार कोशिश करें. हम सभी भारतवासी बखूबी जानते है कि हमारे नेता सिर्फ़ कहने में यकीन करते हैं करने मे नहीं. भगत सिंह जैसा कोई नहीं बन सकता. लेकिन हम नौजवान पीढ़ी उनको अपना गुरु मानकर भारत की दिशा बदल सकते हैं. आज भगत  सिंह के विचारों की प्रासंगिकता पहले से भी ज़्यादा है.

टिप्पणी करे

Filed under विविध

हार्दिक स्वागत है आपका

प्रिय पाठकगण,

Blog संसार में यह मेरा पहला प्रयास है. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं यहाँ पर वह विचार प्रस्तुत करूं जो अपने चारों तरफ़ के समाज को देखकर अनायास ही मेरे मॅन को सुख देते हैं या व्यथित करते हैं. आपका सहयोग, सुझाव एवं आलोचनाएं सदा ही सादर आमंत्रित हैं.

1 टिप्पणी

Filed under विविध