“कुमार विकल” जी हिन्दी के एक बहुत ही जाने माने क्रांतिकारी कवि हुए हैं. कुमार विकल हिन्दी में ‘अकविता’ आन्दोलन के प्रमुख कवियों में से एक रहे। उन्होंने रूसी और विभिन्न भारतीय भाषाओं में कविताऒं का अनुवाद किया हैं. उनका जन्म सन १९३५ में वज़ीराबाद, ज़िला गुजरात (अब पाकिस्तान में) और निधन २३ फरवरी १९९७ को हुआ. एक छोटी-सी लड़ाई (१९८०), रंग ख़तरे में है (१९८७), निरुपमा दत्त मैं बहुत उदास हूँ (१९९३) उनके कुछ प्रमुख कविता संग्रह हुए हैं. उनकी कुछ कविताये मुझे बहुत अच्छी लगी जो मैं यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ . उम्मीद हैं की आप लोगो को भी पसंद आएगी
फर्क
एक छोटी —सी बात को लेकर
मैं बहुत रोया
रोने के बाद बहुत सोया
सोकर उठा तो बहुत सोचा
क्या हर आदमी रोता है?
मार्क्स एंगिल्स और लेनिन भी रोये थे.
हाँ ज़रूर रोये थे
लेकिन, रोने के बाद कभी नही सोये थे
अगर वे इस तरह सोये रहते
तो दुनिया के करोड़ों लोग कभी न जाग पाते.
मशाले
प्रियजन जो कभी मशालों की तरह जलते थे
धीरे-धीरे बुझ रहे हैं
औ’ मेरे इर्द-गिर्द
जो रोशनी के अनेक घेरे थे
दुश्मन अंधेरों के आगे झुक रहे हैं
नहीं, यह कभी नहीं हो सकता
मैं इन मशालों को फिर से जलाऊँगा
चाहे, मैं ख़ुद होम हो जाऊँगा
चीखे
अब चीखने से क्या फ़ायदा
दीवारें इतनी उँची उठ चुकी हैं
कि उनके भीतर
तुम केवल अपनी आवाज़ की अनुगूँज ही सुन पाओगे
और जब दीवारों से अपना सिर टकराओगे
तो अपनी हथेली पर
अपना ही खून पाओगे|
इस तरह ख़ून बहाने से कोई फ़ायदा नहीं
अपनी सुरक्षा मे चक्रव्यूह में
मारा गया आदमी शहादत नहीं पायेगा
इतिहास के पन्नों में याद नहीं किया जायेगा
इतिहास अन्धा नहीं होता
इतिहास दिखता है
इंतज़ार करता है
इतिहास बड़ा क्रूर होता है
लेकिन एक बहादुर माँ की ममता—सा मजबूर होता है|
समय है कि तुम अब भी
अपनी चीख़ को
एक ख़तरनाक छलाँग में बदल डालो
खुदा का चेहरा
एक दिन मैं शराब पीकर
शहर के अजायब घर में घुस गया
और पत्थर के एक बुत के सामने खड़ा हो गया.
गाइड ने मुझे बताया
यह ख़ुदा का बुत है.
मैंने ख़ुदा के चेहरे की ओर देखा
और डर से काँपता हुआ बाहर की ओर भागा
क्या ख़ुदा हा चेहरा इतना क्रूर हो सकता है !
मैं शराबख़ाने में लौट आया
और आदमक़द आईने के सामने खड़ा हो गया
इस बार मैं पागलों की तरह चीखा
और शराबख़ाने से निकल आया
आदमक़द आईने में मैं नहीं था
अजायब घर वाले ख़ुदा का बुत खड़ा था.
मैं एक पार्क में पहुँचा
जाड़े की धूप ऊन के गोले की तरह खुल रही थी
और एक लड़की अपने शर्मीले साथी से कह रही थी
आज के दिन को एक ‘पुलओवर’ की तरह समझो
और इसे पहन लो
और कसौली की चमकती हुई बर्फ़ को देखो
इन दिनों वह ख़ुदा की पवित्र हँसी की तरह चमकती है
ख़ुदा की पवित्र हँसी!
मैं लड़की की इस बात पर ठहाके से हँस दिया.
लड़की चौंकी
लेकिन उसकी आँखों में डर नहीं था
चमकता हुआ विस्मय था
और वह अपने साथी से कह रही थी
उस शराबी को देखो
वह तो ख़ुदा की तरह हँस रहा है.
रंग भेद
कभी—कभी यह शहर
मेरा भी होता है
कम से कम उस रोज़
जब कसौली की सुरमई पहाड़ियों पर पर पड़ी बर्फ़
एक साँवली लड़की के दूधिया दाँतों की तरह चमकती है
और शहर की धूप से अठखेलियाँ करती है.
मैं अपने कविता वर्ष से पहले की कविता लिखता हूँ
और सारे शहर म्रें फैल जाता हूँ
शराबखानों दोस्तों के अड्डों,प्रियजनों के घर
न जाने
कहाँ —कहाँ अपनी नवजात कवित को लिए फिरता हूँ.
जी मेरी कविता गौरवर्णा नहीं
ज़रा साँवली —सी है
एक संथाल बच्ची की तरह खुरदरी
जो बड़ी हो कर
गुलाबी फ़्राक नहीं पहनेगी
आइसक्रीम नहीं खाएगी
तितली नहीं कहलाएगी
नंगे पाँव ही अपने लोगोम के बीच भाग जाएगी.
…. लेकिन यह अपने लोग कौन होते हैं
किस तरह के घरों में रहते हैं
एक नंग—धडंग संथाल कविता के बारे में
किस तरह से सोचते हैं.
यह मुझे अगली सुबह
पता चलता है
जब अख़बार में
कसौली की बर्फ़ और मेरी कविता के बारे में
ख़बरें एक साथ छपती हैं
कसौली की बर्फ़ तो श्वेता बन जाती है
लेकिन मेरी कविता
एक शराबी पिता की
काली कलूटी बेटी कहलाती है
जिसके शरीर से संभ्रांत लोगों को
घटिया शराब की बदबू आती है.
उस समय मुझे पहली बार
अहसास होता है
कि इस शहर में ताँगे क्यों नहीं चलते
मैं किसी घोड़े की गरदन से लिपट कर रोना चाहता हूँ
और बहुत रोना चाहता हूँ
कि जब भी कोई कवि
अपनी कस्विता को
शहर के संभ्रांत हिस्से में लेकर जाता है,
वह हमेशा टूट कर वापिस आता है.
लेकिन मेरी कविता—
मेरी बच्ची
मुझे अपनी साँवली मुस्कान से हर्षाती है
उसकी आँखों में कोई सपना नहीं
एक विश्वास भरी भाषा है
वह मेरी छाती से चिपक जाती है
और उसके अँगों की मज़बूती
मेरी चेतना में फैल जाती है.