दीवानगी

Posted On April 2, 2008

Filed under आवारा मन

Comments Dropped leave a response

आखिरी दम तक हिम्मत ना हारने वाले एक दीवाने के संघर्ष करने की जिजीविषा को एक अजनबी कवि ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया हैं. उम्मीद करता हूँ की पाठको को यह कविता पसंद आएगी..

समां ही अलग थी उस रात की जिस रात की दास्ताँ-ऐ-बयान करने जा रहा था वो
ना था कोई  नाम, ना ही कोई पता
बस एक शब की हथेली पर चला जा रहा था वो.
सूरज की गरमी ने पिघलादी थी आँखें उसकी,
अंधेरे की परछाई बने चले जा रहा था वो.

“थक गया हूँ इस भीड़ भाड़ से,
इस दुनिया की डरपोक चाल से,
मैं ऐसी जगह को जाऊँगा, सितारों से घर बनाऊँगा,
जहाँ इंसान अल्लाह की नही, इंसानों की इबादत करते हैं,
जहाँ इश्क को इश्क से नही पर जूनून से तुलना करते हैं….जूनून से तुलना करते हैं.”

अरे तू  ठहरा पागल लड़का, तेरी बात ना मानू मैं ,
करता है तू अल्लाह की बात पर अपनी हालत देखा है?
तू गिर जाएगा, तू डर जाएगा,
तू गिर जाएगा डर जाएगा, हाड मांस का पुतला ठहरा,
इस दरिया में बह जाएगा.
ला दे दे अपना हाथ मुझे, मैं उस पार पहुँचा दूँगा,
सितारों से तौ पहचान नही, मिटटी का घर बनवा दूँगा.

“छोड़ मुझे बुजदिल की जबान, तू मुझे  कहाँ  ले जाएगा,
जिस किनारे खड़ा है तू, तू उसी भंवर में डूब जाएगा.
तू क्या समझे पागलपन को, कभी आसमा को छूया है?
कभी हवाओं के कंधे पर बैठ, इस जन्नत को देखा है?
इस गिरने के  डर को पाले, क्या तुने कभी उड़ना सीखा है?
मैं गिरता हूँ, चोट लगती है,
मैं गिरता हूँ चोट लगती है, इस हाड मांस  के बदन से
खूनो की चीख निकलती है.

दर्द के मारे आंखें ज़ोर से, कर  लेता हूँ मैं अपनी बंद,
दिखते मुझे वही सितारे, क्या इसको कहते हैं पागलपन?
क्या देखता तू , मुझे इस हैरानियत से?
जा खोज इस पागल को हर एक की इंसानियत में,
मैं पागल नही दीवाना हूँ,
शमा जला कर करदे राख भी तौ क्या?
मैं उसका परवाना हूँ .

इस दर्द में भी एक सुकून हैं, जो मेरे हाथों की लकीर हैं,
गंगा के पानी पर तैरती मेरी अपनी ही ज़मीन हैं,
पहाडों से टकराता हूँ, गीले पत्तो की तरह ठहर जाता हूँ,
यह पाक दीवानगी बुझने का नाम नही लेती,
जलता हुआ ही सही, कहीं और उड़ जाता हूँ.

पर देखना साकी, एक दिन ऐसा भी आयेगा
जब मेरी मोहब्बत अपनी ज़बान फरमाएगा ,
नही कहेगा शब्द, आग से होगी बातें,
अपने होठों के किनारे पिघल जाएँगी रातें.
आँखें ओझल पर पूरी कायनात दिखेगी
यह कोई आम रात नही, क़यामत की रात होगी.
बदन मिलेंगे एक दूसरे से हजारों साल बाद,
हाँ ये दुनिया फ़िर से सजदा करेगी..

जानता तौ मैं भी नही इन सितारों को, पर रिश्ता है बड़ा ही गहरा,
लम्हों के गुलदस्ते में, ये है मेरा फूल सुनहरा,
सितारों से घर ना बना सका तौ क्या,
इस बदन से ही हजारों सितारे बना दूँगा.
उंगलीयों के बीच रख रख कर,
जन्नत को ही रोशन कर दूँगा.

मैं ठहरा दीवाना, मेरी अपनी ही ज़मीन है…
मैं ठहरा दीवाना, मेरी अपनी ही ज़मीन है…”

Respond now.