नास्तिक और आस्तिक
आह ! आज काफी दिनों बाद लिखने के लिए कुछ वक्त निकाल पाया हूँ ! ऐसा नही हैं कि ज्यादा व्यस्त रहता हूँ बस दिन का पता ही नही चलता कि कब बीत गया ! खैर छोडो इस बात को…एक सवाल हमेशा मेरे मन में हमेशा कौधता रहता हैं कि आख़िर इंसान एक ऐसी चीज़ जिसे भगवान अल्लाह गाड़ कहते हैं में क्यों विश्वास करता हैं ! आख़िर इस अंधविश्वास का क्या कारण हैं? परिवार के प्रभाव के कारण मैं भी पहले भगवान् को मानता था ! लेकिन धीरे धीरे जैसे जिंदगी आगे बढ़ती चली गई या यूं कहें जो जो जिंदगी और इस दुनिया कि सच्चाई से रूबरू होता चला गया मेरा विश्वास लोगो के कल्पनालोक में गढे गए इस तथाकथित भगवान से उठता चला गया ! मैं हैरान हूँ कि लोगो के इस विश्वास का क्या आधार हैं ? मुझे बचपन कि एक घटना याद आती हैं जब मन्दिर में मूर्तियों द्वारा दूध पीने कि अफवाह फैली थी ! मैं भी कुछ भक्तिभावना
और कुछ जिज्ञासा वश अपनी बच्चाटोली संग मन्दिर में दूध पिलाने गया लेकिन मेरी चमच से रत्तीभर भी दूध कम नही हुआ ! बस फिर क्या हुआ मैंने पुजारी को पकड़ लिया और पूछा कि क्या माजरा हैं ये ? बस पुजारी को जवाब क्या देना था कह दिया तुम अधर्मी हो तुममे श्रद्धा नही हैं इत्यादि ! लेकिन आज भी मेरे कुछ दोस्त इस घटना को पूरी शिद्दत से भगवान् का ही चमत्कार मानते हैं !
मेरे भगवान् को मानने वाले लोगो से कुछ सवाल हैं! आस्तिक लोग कहते हैं कि इस दुनिया कि रचना भगवान् ने कि हैं ! मैं पूछता हूँ कि आख़िर इस दुनिया को बनाने का क्या कारण हैं ? क्या इसीलिए बनाया हैं कि भगवान अपनी इस रचना से खिलोनो की तरह खेलता रहे ! जिसको जब चाहा भूखा मार दिया किसी को बिना कपड़ो के ठंड से मार दिया या किसी को बमबारी करवा के मरवा दिया जैसे की छोटे बच्चे अपने खिलोनो से खेलते हैं ! कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं हैं ! जब भगवान् सर्व पालनहार सर्वशक्तिमान हैं तो फिर ये स्थिति क्यों हैं ? अब दो ही बातें हो सकती हैं या तो यह सर्व पालनहार, सर्वशक्तिमान परमपर्मेश्वर वाली बात सब बकवास हैं या फिर भगवान् का कोई अस्तित्व ही नही हैं ! केवल समाज के कुछ तथाकथित श्रेष्ठ लोगो ने अपने फायदे के लिए कपोल कल्पित परिकथा की तरह भगवान् की रचना कर दी ताकि उसका डर दिखा कर अपनी मनमानी कर सके और जनता का शोषण कर सके ! आख़िर भगवान् हैं तो उसे इन महलनुमा मंदिरों मस्जिदों गिरिजाघरों की क्या जरुरत हैं ? उसकी ये कोशिश क्यों रहती हैं कि लोग उसे माने उसकी पूजा करे ? ऐसी कहानिया क्यों हैं कि जो भगवान् को नही मानता उसका विनाश हो जाता हैं ? और फिर आख़िर क्यों भगवान् के मन्दिर में ही भेदभाव क्यो होता हैं ? क्यों कुछ तथाकथित वंचित लोगो का मन्दिर में प्रवेश निषेध हैं ? क्यों वंचित पिछडे लोगो के मन्दिर अलग होते हैं? आख़िर क्यों कुछ प्रभावशाली लोगो के मन्दिर में दर्शन के लिए अलग से व्यवस्था होती हैं ? मंदिरों, मस्जिदों गिरिजाघरों के पास जो अकूत ताकत धन दौलत हैं आख़िर उसका क्या राज हैं ? मेरे विचार से अगर उसका कोई अस्तित्व हैं तो वो बहुत लाचार असहाय और बेचारा हैं जो अपने घर को भी ठीक से नही रख सकता !
हिटलर ने तो सिर्फ़ कुछ समय के लिए इस दुनिया को दुःख के सागर में डूबाया कुछ लाख लोगो कि हत्याये कि लेकिन आज उसका इतिहास में
क्या नाम हैं ? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से हिटलर की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं! एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत हिटलर को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित कह सकते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं? इसलिए मैं पूछता हूँ कि उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता और हिटलर में क्या फर्क है ?
January 18, 2008